चुनाव आयोग करेगा ऐसी पार्टियों पर कार्यवाही ?
चुनाव आयोग करेगा ऐसी पार्टियों पर कार्यवाही ?

अघोषित तौर पर जाति की राजनीति पार्टियों की
जड़ में पहुंच चुकी हैं। राजनैतिक पार्टियों के टिकट
देने का फैसला जातियों के आधार पर होने लगा है।
वर्तमान में मौजूदा हर बड़ी पार्टी की सोच यही है
जो निर्वाचन आयोग के नियमों के विरूद्ध है।
पार्टियों की इस अवैध अघोषित रणनीति के चलते
समाज के चंद नेता भी अपने समाज की संख्या के
आधार पर टिकट की मांग करने लगा है।

छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव में कई
टिकटें जाति संख्या के आधार पर तय की गई हैं।
यह बात किसी से छिपी नहीं हैं सभी यह बात
जानते हैं। अब सवाल उठता है कि जिस जाति की
संख्या कम है क्या उस समाज के लोगों के वोट
कोई मायने नहीं रखते? क्या और किसी समाज के
लोग वहां नहीं रहते? जिस समाज का प्रत्याशी
जीतता है वह किसी दूसरे समाज के लोगों के लिए काम नहीं करता?

रायपुर जिले के ही कुछ विधानसभा क्षेत्रों में यह मांग खुले तौर पर की जा
रही है जो अनुचित है।

अनेक समाजों के लोग अपने
समाज से दावेदारी पार्टियों से टिकट के तौर पर
मांग कर रहें है। ऐसे में क्या जिस समाज की
जनसंख्या कम है उसे पार्टियां कभी टिकट ही नहीं
देंगी? विरोधी पार्टिंयां एक ही समाज से अलग
अलग प्रत्याशियों को चुनाव में उतार रहीं हैं। समाज
को प्रतिनिधित्व देने की आड़ लेकर इस तरह का
खेल आजादी के बाद से लगातार जारी है। समाज
को बांटने का काम राजनैतिक पार्टियां धड़ल्ले से कर
रही हैं और चंद लोग अपने समाज के लोगों को
टिकट देने की मांग कर रहें है।

यदि राजनैतिक पार्टियां इस परिपाटी को बंद कर दें तो एक अच्छा
प्रतिनिधित्व किसी भी क्षेत्र को मिल सकता है।
प्रदेश के कुछ क्षेत्र तो ऐसे हैं जहां बारी बारी से
सामाजिक प्रत्याशी अलग अलग पार्टियों से जीतते
आ रहें हैं। यानि समाज अपने समाज के व्यक्ति को
चुनाव में पराजित भी करवा रही है।

यानि समाज को इस बात की चिंता नहीं है कि प्रत्याशी उसके
समाज का है या नहीं, क्योंकि अपने ही समाज के
प्रत्याशी को वह नकार भी रही है यानि समाज के
लोगों ने योग्यता का ध्यान रखा है। लेकिन पार्टियां
इसे लगातार जनता पर थोप रही हैं।

एक ही क्षेत्र में, एक ही समाज के दो-तीन अलग अलग पार्टियों
से प्रत्याशी मैदान पर हैं लेकिन जीतना तो एक ही
उम्मीदवार है ऐसे में समाज ही अपने समाज के
प्रत्याशी को पराजित कर रहा है। क्या यह उन
तथाकथित समाज के नेता जो समाज की आड़ में
टिकटों की मांग करते हैं, के मुंह पर तमाचा नहीं
है।

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