सामरिक दृष्टि से लिए गए राजनैतिक फैसलों का श्रेय किसे ?

इन दिनों इस बात पर बहस और विवाद की स्थिति बनी हुई है कि देश के सामरिक हितों पर लिए गए फैसलों का श्रेय किसी राजनैतिक दल को दिया जाना चाहिए या नहीं ? आजादी के बाद से देश के प्रधानमंत्रियों ने कई ऐसे फैसले लिए हैं जो सामरिक दृष्टि से देशहित में साबित हुए हैं। यदि इतिहास देखें तो इसका श्रेय, फैसले लेने वालों को दिया गया। यदि फैसले गलत लिए गए हों या फिर ऐसे फैसलों के बाद जनता की दृष्टि में वह गलत साबित हुआ हो तो जनता ने उसकी जवाबदारी भी तय की है। वर्तमान में कुछ ऐसी घटनाएं देश में घटी हैं जिसका श्रेय केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने लिया है वहीं उसके कुछ फैसलों को नकारा भी गया है।

राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों में सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट में एयर स्ट्राइक और बालासोर में एंटी सेटेलाइट बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण जैसे बड़े फैसले वर्तमान सरकार ने लिए हैं, लेकिन विपक्ष को इस पर आपत्ति है। आपत्ति उठाना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन सवाल उठता है कि कई अच्छे फैसले कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों ने लिए हैं तो क्या कांग्रेस की तत्कालीन नेतृत्व को उसका श्रेय नहीं दिया जाना चाहिए? लेकिन उन्हें श्रेय दिया गया। मसलन 3 दिसंबर 1971 में बंग्लादेश की आजादी के लिए शुरू हुई लड़ाई जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी को यह श्रेय जनता और विपक्ष ने सम्मान के साथ दिया।

इतिहास में 13 दिन की इस लड़ाई की तारीख को याद करते हैं तो इंदिराजी का चेहरा स्वत: ही दिमाग में आता है। बताया जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल जी ने स्व. इंदिरा गांधी को माँ दुर्गा की संज्ञा दी थी। यह भी इस लड़ाई की तारीख के साथ स्मरण हो उठता है। स्व. इंदिरा जी के इस फैसले ने उन्हें जनता के बीच एक सशक्त प्रधानमंत्री के तौर पर स्थापित कर दिया था। इसके बाद स्व. इंदिरा जी के फैसले की वजह से 18 मई 1974 को पोखरण में परमाणु परीक्षण किया गया जो सामरिक दृष्टि से भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण था।

अंतर्राष्ट्रीय दबावों की परवाह न करते हुए भारत के पहले परमाणु परीक्षण के फैसले का श्रेय भी उन्हें जाता है। लेकिन इसके कुछ वर्षों के बाद उनके द्वारा देश में लगाई गई इमरजेंसी के लिए उन्हें जवाबदार भी माना जाता है और आलोचना भी की जाती है। कुछ एक फैसलों को छोड़ दें तो इंदिराजी का कार्यकाल देश और कांग्रेस का स्वर्णिम कार्यकाल रहा है।

उन्होंने पंजाब में आतंकियों को खत्म करने के लिए स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने का जो निर्णय लिया उसने पंजाब से आतंकियों का पूरी तरह से सफाया कर दिया। इसके लिए उन्होंने अपनी जान की परवाह न कर यह कड़ा फैसला लिया था। इस फैसले की वजह से ही 31 अक्टूबर 1984 को उनकी हत्या कर दी गई थी। इंदिरा जी की हत्या के बाद उनके पुत्र स्व. राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। संचार क्रांति की शुरूआत का श्रेय उन्हें जाता है क्योंकि यह फैसला उन्होंने लिया था। साथ ही 1987 में श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेजने का फैसला भी उन्होंने किया था, तब श्रीलंका सरकार का लिट्‌टे के साथ गृहयुद्ध चल रहा था। यह फैसला लेते वक्त उन्होंने भी अपनी जान की परवाह नहीं की।

उनके फैसलों को सही तो माना जाता है लेकिन परिस्थितियों के अनुकूल नहीं माना जाता वहां भारतीय सेना को काफी नुकसान भी हुआ। 29 जुलाई 1987 को श्रीलंका में सैनिक परेड का निरीक्षण करते वक्त एक सैनिक ने राजीव गांधी पर बंदूक की बट से हमला किया था। इसके बाद लिट्‌टे के आत्मघाती हमलावरों ने चुनाव रैली के दौरान 21 मई 1991 को उनकी हत्या कर दी थी। ऐसे ही कुछ फैसले बाद के गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्रियों ने भी लिए हैं जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आता है। उन्होंने 24 वर्षों के बाद एक बार फिर 11 व 13 मई 1998 को पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण कर एक बार फिर भारत की परमाणु शक्ति का अहसास दुनिया को करवाया। साथ ही मई 1999 में कारगिल मे भारतीय क्षेत्र में कब्जा करने वाले पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना की कार्यवाही का बड़ा फैसला लेते हुए कब्जा किए गए क्षेत्र को मुक्त करवाया इन दोनो ही फैसलों का श्रेय स्व. अटल जी को दिया जाता है वहीं भारतीय सेना को हुए नुकसान के लिए उनकी आलोचना भी हाती है। इसी तरह से कुछ कड़े फैसले वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी लिए है जो पाकिस्तान के आतंकी गतिविधियों के खिलाफ थे।

भारतीय सेना ने आतंकियों के खिलाफ 28-29 सितंबर 2016 की दरमियानी रात पहली कार्यवाही की। भारतीय कमांडो पीओके के भीतर घुसे और आतंकियों के लांचिंग पैड को नष्ट कर दर्जनों आतंकियों का सफाया करते हुए सकुशल वापस भी आ गए। यदि आतंकियों पर कार्यवाही करने का फैसला उन्होंने लिया तो इसका श्रेय भी उन्हें दिया जाना चाहिए। इसके बाद जैश के एक आतंकी ने 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में आत्मघाती हमला कर 40 से अधिक जवानों को शहीद कर दिया। घटना के जिम्मेदार जैश ए मोहम्मद के पाकिस्तान में खैबर पख्तून प्रांत के बालाकोट स्थित आतंकी प्रशिक्षण शिविर को 26-27 फरवरी 2019 की दरम्यानी रात को भारतीय सेना ने एयर स्ट्राइक कर नष्ट कर दिया और बड़ी संख्या में आतंकियों को मार गिराया।

घटना के बाद देश की जनता का गुस्सा फूटा और वह आतंकियों से बदला चाहती थी इसके अनुरूप प्रधानमंत्री ने फैसला लिया और सेना के जवानों ने अपनी क्षमता का इज़हार पूरी दुनिया को करवा दिया। इस फैसले का श्रेय पिछले प्रधानमंत्रियों की तरह उन्हें दिया जाय तो इसमें कोई शक की गुजाइश नहीं होनी चाहिए। इसी तरह से 27 मार्च 2019 को सामरिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण परीक्षण किया गया जिसमें भारत ने अपने आप को विश्व के उन चार देशों में शामिल कर लिया जिन्होंने जीवित सेटेलाइट को उसकी कक्षा में मार गिराने परीक्षण किया। यह सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भ्री देश के सेटेलाईट को मार गिराना उसे सामरिक दृष्टि से वर्षों पीछे धकेल देने के बराबर होता है। सामरिक हाथियार जो सेटेलाइट के माध्यम से चलते हैं वे पंगु बन जाते हैं इसमें मिसाइलें और संचार प्रणाली जैसे महत्वपूर्ण उपकरण शामिल हैं। इस फैसले का श्रेय भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दिया जाना चाहिए। आज तक सेना के किसी भी कार्यवाही पर देश ने कभी कोई शंका जाहिर नहीं कि और न ही किसी नेता या पार्टी ने इस तरह की हरकत की। लेकिन बीते 5 वर्षों में सेना की कार्यवाही पर विक्षियों ने सबूत मांगने का काम किया है जो घोर निंदनीय है। देश अपनी सेना पर पूरा विश्वास करता है इसलिए देश की रक्षा के लिए उसके बलिदान और साहस भरे कार्य के सबूत नहीं मांगे गए और न ही उसपर कभी सवाल खड़ा किया गया क्योंकि ऐसी परंपरा हमारे देश कभी नहीं रही है।

यदि आपके पास क्षमता है आप क्षमतावान हैं लेकिन आपने अपनी क्षमता का प्रदर्शन और परीक्षण नहीं किया है तो इसे एक झूठ के बराबर कहा जाता है क्योंकि ये आपके पास है लेकिन आपने उसे कभी नहीं दिखाया। यह आपकी क्षमता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करने साथ ही इसके जनकों को निराश कर देने वाला होता है। परीक्षण कर क्षमता का प्रदर्शन करने का निर्णय लेने वाले किसी भी नेतृत्व को उसका श्रेय दिए जाने का इतिहास रहा है। क्योंकि इ्रसे देश के नेतृत्व की राजनैतिक इच्छाशक्ति से जोड़कर देखा जाता है। सम्पादकीय :- मनीष शर्मा

ये तो होना ही था…

आखिरकार अपनी स्वतंत्रता का भरपूर उपयोग करते हुए भारतीय वायु सेना ने नियंत्रण रेखा पार कर बालाकोट में जैश के आतंकी ट्रेनिंग सेंटर और कंट्रोल कमांड अल्फा 3 में जबरदस्त हवाई हमला कर कई दर्जन आतंकियों, कमांडरों और ट्रेनर को मार गिराया। निश्चित रूप से देश की सेना एक बड़ा काम किया है। यदि इतिहास देखें तो आतंकियों पर कार्यवाही के लिए किसी देश की सीमा लांघ कर हवाई हमले करना एक बड़ी चुनौती है जब विश्व में ऐसे हथियार आ गए हैं जो मिनटों के भीतर ही ऐसे अतिक्रमण करने वाले विमान को नष्ट कर सकते हैं। भारतीय वायुसेना विश्व की चौथी सबसे काबिल सेना मानी जाती है। जहांतक मिराज विमानों का सवाल है यह उसके लिए यह सबसे सफल कार्यवाही में से एक मानी जाएगी। कारगिल युद्ध के दौरान दो मिराज विमानों को पाकिस्तान ने मार गिराया था। पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों इस बात जिक्र करते रहे कि आतंकियों ने एक बड़ी गलती की है और इसकी बड़ी कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ेगी। किसी भी प्रधानमंत्री का ऐसा बयान हल्के में नहीं लिया जा सकता। उन्होंने निश्चित रूप से अपने बयान के अनुरूप ही कार्य किया है। पुलवामा हमले पर कई सवाल उठाए गए, सवाल उठाना गलत नहीं है। लेकिन कार्यवाही को लेकर भी विपक्षी पार्टियों का यह कहना कि भारत कार्यवाही क्यों नहीं करता यह नासमझी भरा और राजनीति से प्रेरित है। कार्यवाही करने के पहले तैयारियां की जाती है जो सफलता के लिए जरूरी है। आखिरकार तैयारियों के बाद घटना के 13वें दिन भारतीय वायुसेना ने आतंकियों की 13वीं कर दी है। किसी भी देश के प्रधानमंत्री का बयान बेहद महत्वपूर्ण होता है। उसके एक बयान के बाद शासन तंत्र उसके अनुरूप कार्य करने लगता है। विपक्ष को भारत में प्रधानमंत्री मोदी के बयान को समझना चाहिए था। वायुसेना के इस हमले के बाद पाकिस्तान इस पर क्या प्रतिक्रिया करता है इसे देखते हुए सेना पूरी तरह से तैयार है। इस हमले के पहले बालाकोट सहित पाकिस्तान में मौजूद सभी आतंकी ठिकानों को डोजियर में शामिल कर पाकिस्तान को दे दिया गया था लेकिन पाकिस्तान को कोई कार्यवाही नहीं की ऐसे में भारत इस कार्यवाही को सफलतापूर्वक अंजाम दे दिया है। मनीष शर्मा …

वादों को पूरा करने की कोशिश, निशाने पर लोकसभा 2019

बजट 2019 पेश करने 15 साल बाद एक बार फिर कांग्रेस की नई सरकार ने जनता के सामने आपने विकास का ऐजेन्डा रखा। बीते चुनाव में जिस तरह से किसानों की समस्या और उनको फायदा पहुंचाया गया है उसका कुछ अंश बजट में शामिल किया गया है। बीते विधानसभा चुनाव के दौरान की गई घोषणाओं को कांग्रेस ने अपने इस बजट में केन्द्रित किया है। लेकिन कुछ बातें इस बजट में नहीं है। जैसे शराबबंदी की बात जो कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के पूर्व कही थी। ग्रामीण परिवेश या रहन सहन को बचाने नरवा, गरूआ, घुरवा और बारी के विकास के लिए काफी प्रावधान इस बजट में हैं। कृषि के विकास के अंतर्गत आने वाली इन बातों के अलावा कुछ पुराने किसानों को भी इस ऋण माफी योजना में शामिल किया गया है। हालांकि ऋण माफी के उन मामलों को नहीं छुआ गया है जिन्होंने राष्ट्रीयकृत बैंकों से कृषि ऋण लिया है। इसी तरह से युवाओं के लिए बड़ी योजना का अभाव नज़र आया है। तेंदुपत्ता खरीदी की प्रतिबोरा दर में 15 सौ रूपयों की वृद्धि की गई है जो तेंदुपत्ता संग्राहकों के लिए फायदेमंद साबित होगा। 400 यूनिट तक बिजली बिल आधा करने की घोषणा कर आम जनता को फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई है। ज्यादातर उन वादों को पूरा करने की कोशिश की गई है जिनकी घोषणा बीते विधानसभा चुनाव के पूर्व की गई थी। कुल मिलाकर देखें तो देश की किसी भी पार्टी के लिए सबसे बड़ा निशाना लोकसभा चुनाव 2019 है उसी तरह से प्रदेश की नई कांग्रेस सरकार का निशाना भी राहुल गांधी के नेतृत्व में देश में कांग्रेस सरकार बनाने का नज़र आ रहा है। विकास कार्यों के लिए बहुत ज्यादा बातें इस बजट में नहीं हैं बल्कि जनता को लाभ देने की कोशिश ज्यादा की गई है यदि हम कहें कि एक बार फिर किसानों के माध्यम से 2019 जीतने का प्रयास इस बजट में किया गया है तो गलत नहीं होगा।

क्या रद्द होगा नरेन्द्र मोदी का रायगढ़ दौरा ?

रायपुर: देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 6 फरवरी को रायगढ़ दौरे पर जा रहे हैं । प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पीएमओ को चिट्‌ठी लिखी है जिसमें कहा गया है कि 6 फरवरी को प्रदेश का बजट पेश किया जाना है और उनके दौरे की वजह से विपक्ष सत्र के दौरान मौजूद नहीं रहेगा ऐसे में उन्होंने प्रधानमंत्री का दौरा रद्द करने का अनुरोध किया है। चूंकि प्रधानमंत्री मोदी छत्तीसगढ़ में मौजूद रहेंगे अत: प्रदेश के कई विधायकों सहित सभी बड़े नेता जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी रायगढ़ में प्रधानमंत्री की सभा में मौजूद होंगे। विधानसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के सदस्यों का मौजूद न रहना सत्तापक्ष को अच्छा नहीं लगेगा। आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र प्रदेश की जनता के लिए बड़ी घोषणाएं भी की जा सकती है। बजट पर बहस में भाग लेने के लिए विपक्ष का मौजूद न रहना एक स्वस्थ बजट सत्र में सत्तापक्ष के लिए वैसा ही होगा जैसे एक टीम के न आने की वजह से दूसरी टीम को वाकओव्हर मिल गया हो। क्या प्रदेश के मुख्यमंत्री का अनुरोध पीएमओ को मंजूर होगा? यह बड़ा सवाल है लेकिन यदि प्रथम दृष्टया देखें तो प्रधानमंत्री का रायगढ़ दौरा रद्द होता नज़र नहीं आ रहा है। क्योंकि प्रधानमंत्री का दौरा काफी पहले से तय है और सारी व्यवस्थाएं पहले से की जा चुकी हैं। आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए प्रधानमंत्री कई राज्यों में दौरा कर चुके हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव का रिजल्ट भाजपा के लिए बेहद खराब रहा है और इसका असर लोकसभा चुनाव में पड़ने की आशंका के चलते प्रदेश में प्रधानमंत्री का दौरा बेहद महत्वपूर्ण है। और वैसे भी रायगढ़ से इस बार नये प्रत्याशी को मैदान में उतारे जाने की संभावना ज्यादा दिखाई दे रही है। इन बातों पर नज़र डालें तो प्रधानमंत्री का दौरा रद्द नहीं होने की पूरी संभावना है।

चुनाव आयोग करेगा ऐसी पार्टियों पर कार्यवाही ?

चुनाव आयोग करेगा ऐसी पार्टियों पर कार्यवाही ?

अघोषित तौर पर जाति की राजनीति पार्टियों की
जड़ में पहुंच चुकी हैं। राजनैतिक पार्टियों के टिकट
देने का फैसला जातियों के आधार पर होने लगा है।
वर्तमान में मौजूदा हर बड़ी पार्टी की सोच यही है
जो निर्वाचन आयोग के नियमों के विरूद्ध है।
पार्टियों की इस अवैध अघोषित रणनीति के चलते
समाज के चंद नेता भी अपने समाज की संख्या के
आधार पर टिकट की मांग करने लगा है।

छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव में कई
टिकटें जाति संख्या के आधार पर तय की गई हैं।
यह बात किसी से छिपी नहीं हैं सभी यह बात
जानते हैं। अब सवाल उठता है कि जिस जाति की
संख्या कम है क्या उस समाज के लोगों के वोट
कोई मायने नहीं रखते? क्या और किसी समाज के
लोग वहां नहीं रहते? जिस समाज का प्रत्याशी
जीतता है वह किसी दूसरे समाज के लोगों के लिए काम नहीं करता?

रायपुर जिले के ही कुछ विधानसभा क्षेत्रों में यह मांग खुले तौर पर की जा
रही है जो अनुचित है।

अनेक समाजों के लोग अपने
समाज से दावेदारी पार्टियों से टिकट के तौर पर
मांग कर रहें है। ऐसे में क्या जिस समाज की
जनसंख्या कम है उसे पार्टियां कभी टिकट ही नहीं
देंगी? विरोधी पार्टिंयां एक ही समाज से अलग
अलग प्रत्याशियों को चुनाव में उतार रहीं हैं। समाज
को प्रतिनिधित्व देने की आड़ लेकर इस तरह का
खेल आजादी के बाद से लगातार जारी है। समाज
को बांटने का काम राजनैतिक पार्टियां धड़ल्ले से कर
रही हैं और चंद लोग अपने समाज के लोगों को
टिकट देने की मांग कर रहें है।

यदि राजनैतिक पार्टियां इस परिपाटी को बंद कर दें तो एक अच्छा
प्रतिनिधित्व किसी भी क्षेत्र को मिल सकता है।
प्रदेश के कुछ क्षेत्र तो ऐसे हैं जहां बारी बारी से
सामाजिक प्रत्याशी अलग अलग पार्टियों से जीतते
आ रहें हैं। यानि समाज अपने समाज के व्यक्ति को
चुनाव में पराजित भी करवा रही है।

यानि समाज को इस बात की चिंता नहीं है कि प्रत्याशी उसके
समाज का है या नहीं, क्योंकि अपने ही समाज के
प्रत्याशी को वह नकार भी रही है यानि समाज के
लोगों ने योग्यता का ध्यान रखा है। लेकिन पार्टियां
इसे लगातार जनता पर थोप रही हैं।

एक ही क्षेत्र में, एक ही समाज के दो-तीन अलग अलग पार्टियों
से प्रत्याशी मैदान पर हैं लेकिन जीतना तो एक ही
उम्मीदवार है ऐसे में समाज ही अपने समाज के
प्रत्याशी को पराजित कर रहा है। क्या यह उन
तथाकथित समाज के नेता जो समाज की आड़ में
टिकटों की मांग करते हैं, के मुंह पर तमाचा नहीं
है।

ऐसे हादसों के जिम्मेदार कौन ?

चुनाव आयोग करेगा ऐसी पार्टियों पर कार्यवाही ?

– मनीष शर्मा –

अमृतसर रेल हादसा अब तक सबसे बड़ा हादसा है
जिसमें किसी धार्मिक कार्यक्रम के दौरान ट्रेन से
कटकर मारे गए हों। लेकिन हादसों की जिम्मेदारी
किनकी है और क्या जिम्मेदार विभाग सामने
आएगा? यह हमेशा से प्रश्नवाचक चिन्हों में रहा है।

यदि हम इस पूरी घटना का अवलोकन करें तो इस
हादसे में सबसे ज्यादा जिम्मेदार वह आयोजन
समिति नज़र आती है जिसने ऐसे जगह पर
कार्यक्रम का आयोजन किया बल्कि व्यवस्था के नाम
पर कुछ भी नहीं किया।

आयोजकों ने रेल्वे पटरी पर बैठकर या खड़े होकर लोगों को कार्यक्रम देखने
को मजबूर किया। यदि ऐसा करना ही था तो इसके
लिए रेल्वे से इज़ाजत लेनी थी ताकि रेल्वे प्रशासन
इस हेतु उचित व्यवस्था अपनी ओर से करती।
इतना ही नहीं एक एलईडी स्क्रीन भी इसी हादसे
वाली जगह की ओर लगाई गई थी।

ताकि उस ओर से लोग कार्यक्रम देख सकें इसके अलावा आयोजकों
को साथ बार बार लोगों को सचेत भी किया जाना
चाहिए था कि रेल्व पटरी पर खड़े होकर कार्यक्रम
न देखें बल्कि पटरियों से दूर हटकर कार्यक्रम देखें,
लेकिन ऐसा नहीं किया गया। वहीं दूसरी बड़ी गलती
यदि कहें तो उस जनता की भी है जो पटरियों पर
खड़े होकर कार्यक्रम देख रहे थे।

ऐसा एक बड़ा रिस्क था यह रिस्क और ज्यादा तब हो जाता है
जब वहां पटाखे भी फूट रहें हों, क्योंकि पटाखों की
आवाज में ट्रेन की आवाज का लुप्त होना निश्चित
है।

ऐसे में सतर्क रहने वाला भी चपेट में आ सकता
है। जहां पर व्यवस्था न हों वहां किसी भी तरह का
कार्यक्रम देखने से हमें परहेज करने की जरूरत है।
ज्यादातर कार्यक्रमों में ऐसी व्यवस्था एक खास वर्ग
के लिए की जाती है बाकी अपने जोखिम पर
कार्यक्रम देखते हैं।

आयोजकों को इस बात की भी जानकारी होती है लेकिन व्यवस्था फिर भी नहीं की
जाती। ऐसे में अव्यवस्था वाले कार्यक्रमों से जनता
को दूर रहना चाहिए। कार्यक्रमों में भीड़ की दरकार
सभी आयोजकों को होती है ऐसे में बगैर व्यवस्था
वाली जगहों पर जाने से परहेज किया जाए तो
आयोजकों को मजबूरन व्यवस्था करनी पड़ सकती
है।

रेल्वे प्रशासन से यदि आयोजकों ने इज़ाजत
नहीं ली है तो वह अपनी रूटीन चेकिंग और धार्मिक
कार्यक्रम के मद्देनजर भीड़ वाली जगह पर ट्रेन धीमी
कर लोगों को ट्रेन के आने की जानकारी देने की
व्यवस्था करती। ऐसे में रेल्वे भी अपनी जिम्मेदारी
से बच नहीं सकती ।

इस घटना के दौरान गुजरने वाली ट्रेन इतनी तेज गति से घटनास्थल से गुजरी
कि चंद सेकंडों में ही कई दर्जन लोग काल के गाल
में समा गए। इसके पहले पड़ने वाले रेल्वे क्रासिंग
पर मौजूद गार्ड भी ट्रेन को इस बात के संकेत दे
सकता था कि ट्रेन धीमी चलाएं और लगातार हार्न
बजाया जाए, क्योंकि यह कार्यक्रम हर वर्ष होता है
इसकी जानकारी इस गार्ड को भी थी।

लेकिन यह लापरवाही भी सामने आयी है। यदि ड्राईवर इस
जगह पर भीड़ देखकर इमरजेंसी ब्रेक लगा देता तब
ट्रेन की गति को देखते हुए ट्रेन के दुर्घटनाग्रस्त होने
की आशंका थी।

ट्रेन निर्देशों और संकेतों पर चलते
हैं और सही समय में सही निर्देश यदि ड्राईवर को
मिलता तो यह घटना टाल जा सकती थी।

 

कांग्रेस के दांव ने तीन राज्यों में भाजपा की मुश्किल बढ़ाई?

– मनीष शर्मा
कांग्रेस पार्टी को सत्ता में लाने के लिए उनके नेता तरह तरह के दांव आजमाने लगे हैं। कांग्रेस इस बात की चिंता नहीं कर रही कि जो दांव वो अजमा रही है वह देश की जनता और देश के लिए कितना घातक है। पिछले कुछ दिनों से गुजरात से यूपी और बिहार के हजारों लोग पलायन कर चुके हैं। इन दोनो ही राज्यों से हजारों लोग रोजगार कर रहे थे या फिर रोजगार की तलाश में गुजरात में रह रहे थे ।
एक घिनौनी वारदात जिसके अपराधी पुलिस की गिरफ्त में हैं, के चलते गुजरात के कांग्रेस नेता और कभी हार्दिक पटेल के साथी रहे अल्पेश ठाकोर ने एक ऐसा बयान दिया जिसमें उन्होंने यूपी और बिहार के लोगों पर कई गंभीर आरोप लगाए, साथ ही उनके समर्थकों ने इन राज्यों के लोगों को गुजरात छोड़ने की चेतावनी देते हुए जगह जगह मारपीट भी की। परिणाम स्वरूप पिछले कुछ ही दिनों के भीतर लोग अपने राज्य लौटने लगे।
कांग्रेस के विधायक अल्पेश ठाकोर ने भाजपा के लिए तीन राज्यों में मुश्किल बढ़ाने का काम किया है लेकिन इसे किसी भी दृष्टि से सही नहीं ठहराया जा सकता। कांग्रेस के इस नेता ने यह जरा भी नहीं सोचा कि इससे क्षेत्रवाद और विभिन्न राज्यों के लोगों के बीच वैमनस्व बढ़ेगा। बावजूद इसके पलायन के दौरान अल्पेश ठाकोर मीडिया के सामने आते हैं और सफाई देते हैं, कि वे इस तरह की राजनीति नहीं करते। साथ ही उन्होंने यह दावा भी किया कि यूपी, बिहार के लोगों के पलायन के जिम्मेदार वे नहीं है और न ही उन्होंने कभी ऐसा बयान दिया उनका कहना था कि यदि एक भी ऐसा बयान दिखला दें तो वे राजनीति छोड़ देंगे। लेकिन अब सोशल मीडिया में उनका एक बयान आ गया है जिसमें एक सभा में गुजरात में रहने वाले लोगों के खिलाफ बयान दे रहें हैं। राजनीति में झूठ बोले जाने हजारों उदाहरण देखा गया है उसमें एक और झूठ अब शामिल हो गया है।
कांगेस अपने इस नेता पर क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने की इस करतूत के लिए उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नही की है। वहीं गुजरात पुलिस ने ऐसे भड़काउ बयान देने वाले कुछ लोगों की गिरफ्तारी जरूर की है। अल्पेश ठाकोर की इस करतूत का सीधा निशाना प्रधानमंत्री मोदी हैं अब वाराणसी में मोदी के खिलाफ पोस्टर लग रहें हैं क्योंकि वे गुजराती हैं और गुजरात से आकर वाराणसी से सांसद हैं। ऐसे कई गुजराती हैं जो देश के अन्य राज्यों में अपना व्यवसाय कर रहें हैं ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अल्पेश गुजरात के लोगों के साथ न्याय कर रहें हैं?  यह लग रहा है कि कांग्रेस और उसके नेता इस प्रकरण में अपनी पार्टी के हित की भी नहीं सोच रहें है। मामले को ढांकने की पूरी कोशिश कांग्रेस और भाजपा दोनो तरफ से हो रही है। उधर राहुल गांधी यह बयान दे रहें हैं कि यह पलायन रोजगार को लेकर है जबकि गुजरात के मुख्यमंत्री का कहना है कि लोग छठ पूजा की वजह से वापस जा रहें हैं। दोनो ही बयानों पर यकीन नहीं किया जा सकता जब सारी चीजे खुलकर सामने है।  जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था खाउंगा न खाने दूंगा। कांग्रेस यहां एक कदम आगे निकल चुकी है अब वह खाना भी बर्बाद करने पर तूली हुई है। मुद्दों पर राजनीति न करते हुए एक ऐसे रास्ते पर चल रही है जो देश की जनता और राज्यों के बीच खाई खोदने का काम कर रही है।
उधर भाजपा की मुश्किलें इस मामले को लेकर बढ़ी हुई है। अगामी दिनों में लोकसभा चुनाव है जो देश भर में होंगे। एसे में गुजरात, यूपी और बिहार के लोगों की नाराजगी वह झेल नहीं सकती। शायद यही वजह है कि उनकी गुजरात सरकार अल्पेश को गिरफ्तार नहीं कर पा रही है और न ही यूपी बिहार के लोगों का पक्ष ले पा रही है। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि इस तरह के क्षेत्रवाद की राजनीति का असर अन्य राज्यों पर नहीं पड़ेगा।